खान-पान और चरित्र ख़राब होने के कारण ही मानवता खत्म होती जा रही है।

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शंकर जी का प्रसाद समझकर गांजा, भांग, धतूरा खाना अज्ञानता है – बाबा उमाकान्त जी महाराज

बाबा जयगुरुदेव आश्रम, उज्जैन बाबा उमाकान्त जी महाराज ने बताया कि पौराणिक कथाओं में मिलता है कि जब युग बदला, मलिनता आ गई तो लोग शंकर जी को नहीं देख पा रहे थे, तब श्रद्धा भाव बनाए रखने के लिए शिवरात्रि के दिन शिव लिंग प्रकट हुआ था।
लोग शिवलिंग पर भांग, धतूरा इत्यादि चढ़ाते हैं, अब क्यों चढ़ाते हैं और उससे क्या फायदा होता है? ये तो वे जानें, लेकिन हमको तो यह लगता है कि उससे कोई फायदा नहीं होता है। ये तो उस समय की बात है जब समुद्र मंथन हुआ था, उसमें देवता और दैत्य दोनों मौजूद थे।
जो अच्छी चीज़ें थीं उनका बँटवारा तो उन लोगों ने कर लिया, लेकिन अमृत का कलश लेकर धनवन्तरी आख़िर में जब निकले तब दैत्य चाहने लगे कि हम अमृत पी जाएँ और अमर हो जाएँ। देवता ऐसा नहीं चाहते थे, क्योंकि राक्षस अधिक शक्तिशाली पड़ते और देवता कमज़ोर पड़ जाते तो धर्म खत्म हो जाता, श्रद्धा लोगों की खत्म हो जाती और व्यवस्था बिगड़ जाती।
दैत्य अथवा राक्षस उनको कहते हैं, जिनका खान पान सही नहीं रहता, बुद्धि एवं चाल-चलन ख़राब हो जाता है। जैसे इस समय पर ज़्यादा राक्षसी प्रवृत्ति बढ़ रही है। खान-पान और चरित्र ख़राब होने के कारण ही मानवता खत्म होती जा रही है। तो देवताओं ने सोचा कि ये दैत्य हमारे ऊपर हमला कर देंगे और तमाम कथाओं में मिलता है कि ऐसा होता भी था।

धतूरा और भांग का पौराणिक इतिहास

समुद्र मंथन में हलाहल यानी विष भी निकला था। उसको शंकर जी ने पिया था और ऊपर गले में ही रखा था लेकिन वह ऊपर असर करने लग गया था। तब देवताओं, धन्वंतरि इत्यादि ने धतूरा और भांग को ऊपर से सिर पर रखा। दोनों ज़हरीले होते हैं और दोनों में नशा होता है। कोई ज़हरीली चीज़ आदमी खा लेता है तो हल्का नशा होता है और तेज जहर खा लेता है तो बेहोश हो जाता है, खत्म हो जाता है। तो उस समय की बात है।
अब लोगों ने वही प्रणाली बना लिया, फिर उसी को लोग प्रसाद रूप में खाने लग गए। फिर भांग-गांजा, धतूरा को लोगों ने शंकर जी का प्रसाद मान कर, बूटी समझ कर पीने-खाने लग गए। इसको अज्ञानता कहा जाएगा, उनको ज्ञान नहीं हुआ, उनको कोई ज्ञान कराने वाला नहीं मिला।
अब देखो एक आदमी भांग खाने लग गया, तो सब भांग खाने लग जाते हैं। कहते हैं हम शंकर जी के भक्त हैं, गांजा पियेंगे तभी भक्त कहलायेंगे, धतूरा खाएँगे तभी भक्त कहलायेंगे। तो यह अज्ञानता है, अज्ञानता में आप मत फंसना।

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